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Saturday, October 10, 2026

07102026 धर्म - बृह्माण्ड के संतुलन के आधार और रिलीजन

धर्म - बृह्माण्ड के संतुलन के आधार और रिलीजन
     मेरॅ लेखों में मैंने धर्म शब्द का प्रयोग किया है और कई अंग्रेजी अनुवादों ने उसे रिलीजन का नाम दे दिया। ओहो! महाभारत के धर्मयुद्ध के बारे में तो आप सभी भलीभांति अवगत होंगे। फिर ऐसे भ्रमित अनुवाद के आधार पर धारना कैसे बना सकते हैं?
     यदि धर्मयुद्ध के संबंध में विचार करें तो लगता है जैसे धर्मयुद्ध मतलब न्याय युद्ध होगा और धर्म मतलब न्याय। लेकिन सम्पूर्ण रूप से ऐसा भी नहीं है। युगों युगों से ब्रह्मा, विष्णु और शिव मानवों के महानतम शक्तिमान रहे और उन्होंने ब्रह्म आचार, व्यवहार और विधियों का प्रचार किया जिसे हम आज के हिन्दु धर्म के रूप में अनुसरण करते हैं। इन त्रिदेवों ने और अनेकों बृह्मऋषियों ने इस पर अपना प्रभाव डाला और इस में तीन पंथ और विभिन्न विचार भी मिलते हैं। उन युगों में भी हिरण्यकश्यप और कंश जैसे असुरों ने अपने आप को ईश्वर बतलाने और अपना धर्म (रिलीजन) चलाने की कोशिश की थी परन्तु संहार कर दिए गए। और रावण ने तो बृह्मा और शिव की उपासना की परन्तु विष्णू और अन्य देवों का तिरस्कार। क्या इन सभी के बीच मनमुटाव की कोई साजिश करते थे? किन्तु इन युगों में भी बृह्य आचार, व्यवहार और विधियाँ सभी स्वीकार करते थे क्योकि बृह्म शक्ति ही सर्वोच्च शक्ति मानी जाती थी और सम्पूर्ण बृह्माण्ड के संतुलन का आधार। यह अनश्वर्य मानी जाती थी और इसमें असंतुलन बृह्माण्ड के विनाश का कारण। इसका शास्वत आधार बना शास्वत धर्म का आधारभूत और धर्म का अर्थ रिलीजन से समझने की विचारधारा। अंन्व कारक, चाहे अच्छे या बुरे, जो इन आचार, व्यवहार और विधियों पर असर करते थे वो अपनी धार्मिक विचारधारा का प्रचलन करने लगे। जो अच्छे थे वो प्रचलित हुए और जो बुरे थे वो नष्ट किए गए।
      इसी अच्छाई-बुराई ने शुरू की मनुष्यों में अच्छाई और बुराई के विषय में जिज्ञासा एवं इसे सोचने, समझने और व्याख्या करने की अभिलाषा। और इसलिए वेद, पुराण और कई अन्य ग्रंथ लिखे गए। इनके आधार पर मनुष्य को इस प्रकृति में जीवन निर्वाह करने और सामाजिक, प्राकृतिक एवं बृह्म संतुलन बनाए रखने के विषय में ज्ञान दिया। इसी क्रिया का नाम धर्म है, जैसे राजधर्म, राजनैतिक धर्म, कर्मचारी धर्म, युद्ध धर्म,  सैनिक धर्म, सेवक धर्म, इत्यादि। इस प्रकार इन ग्रंथों ने अपने समय के समाज के प्रतीक अंश के विषय में ज्ञान दिया जिसे गुरूकुल में सीखकर विद्यार्थी  समाज के विद्वान बनते थे और समाज सुचारू रूप से चलाने के कारक। इन्हें और सरल एवं अनिवार्य बनाने के लिए नियम, कानून एवं संविधान बनाए गए।अतः हम समझ सकते हैं कि कोई भी नियम, कानून, संविधान, ग्रंथ, धर्म आदि सम्पूर्ण मानवता के लिए अनिवार्य नहीं हैं और न ही कभी पर्याप्त हो सकते हैं। ये सिर्फ अपने अधिनस्थ पर नियम बनते हैं और अपने अनुयायी के लिए धर्म। इसलिए धरती पर राजकर्ताऔं ने कानून और संविधान बनाए और परलौकिक शक्तिमानों ने धर्म-पंथ। 
       आज के युग में हमने एसे धर्म-पंथों को एक नया नाम देना शुरू किया जिसे हम धर्म अथार्थ रिलीजन कहते हैं। इन्होंने अपने आचार, व्यवहार, विधि तथा विधान का विकास किया है और अपने पूर्व धर्म से कुंठित होकर कुछ नया करने, कुछ अपने अनुरूप करने और पूर्व विधि-विधान का तिरस्कार करने की क्रियाऔं का उपयोग है। किन्तु यह नए युग का असर है और नया युग कलयुग है। महाभारत में श्रीकृष्ण ने कहा था कि आत्मा अनश्वर्य है और आज आत्मा एवं आत्मालोक भी नश्वर्य है। यह बृह्म शक्ति का असर है। शनैः शनैः धरा और मानव अपने नए युग में ढल रहे है।   IPYadav 
Note : for exclusive follow-ups or for business/social/political purpose, you can contact me. There are no agents or representatives.

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