तेल की खरीददारी हमेशा से देश की अर्थव्यवस्था पर एक बोझ रहा है लेकिन उन्नति और बढती अर्थव्यवस्था के समक्ष यह बोझ क्षीण हो जाता था। ग्रीन ऐनर्जी से यह बोझ कम किया गया परन्तु नए उपभोक्ताओं से यह बोझ बरकरार रहा। परन्तु सम्भावित कीमतों पर यह खर्च और इनकी उपलब्धि अति भारी पड सकती है। हालांकि देश के नेता इनकी उपलब्धि में दिक्कतों से इन्कार करते हैं किन्तु इनकी कीमतों का कोई अनुमान और विश्लेषण नहीं है।
क्या यह बोझ क्षीण ही रहेगा या फिर विकराल बनेगा? यदि और हालात बिगडे तो क्या स्थिति होगी? इन हालातों को देखते हुए देश के नेताओं को इसे एक अवसर के रूप में उपयोग करना चाहिए। बजाय इसके की मीडिया गैस और तेल की लाइनों की और किल्लत की चर्चा करे और नरभक्षी असहाय जनता के भक्षण का अवसर मनाएँ, नेताओं को और विभिन्न एनजीओ को सरकारी अधिकारियों के सुनियोजन से इसे एक संभावित आपात स्थिति से निपटने के सुअवसर की तरह "प्रयोग करना" चाहिए। पूरे देश में स्वेच्छा से सम्मिलित और जहाँ जरूरत हो वहाँ अनिवार्य नीति से सम्मिलित करके विभिन्न उपायों के प्रयोग करने चाहिए। इससे मौजूदा स्थिति पर दबाव कम होगा और भविष्य की आपात स्थिति से निपटने के लिए प्लान, तैयारी, प्रशिक्षण और अनुभव तैयार होगा।
मेरे कुछ सुझाव :
1) कम्यूनिटी किचिन- (स्वेच्छिक) अपनी अपनी कम्यूनिटी/ पार्टी के भरोसेमंद दैनिक भोजनालय जहाँ नाम पता रजिस्टर कराने वालों को सस्ती थाली रोज उपलब्ध हो। (ध्यान रहे कि कार्यकर्ता पलटकर घर पर न पहुँचें)।
2) ऐसे कम्यूनिटी किचिन में सरकारी सहायता से ग्रीन ऐनर्जी के चूल्हे। (आपात स्थिति के बाद भी इन्हें कैप्टन की तरह उपयोग कर सकते हैं)।
3) टू व्हीलर को ई वी में बदलने के लिए सस्ता लोन।
4) ग्रीन ऐनर्जी से चार्जिंग की भरपूर उपलब्धी।
5) मालवाहक के लिए ई वी का उपयोग और उनकी ग्रीन ऐनर्जी से चार्जिंग की भरपूर उपलब्धी।
6) स्वदेशी परिस्थितियों के अनुसार ग्रीन ऐनर्जी की स्वदेशी मशीनरी/ यन्त्र विकसित करना ताकि विदेशी पेटेन्ट/ कापीराइट/ टोपोराइट के चार्जस् कम रखें और स्वदेशी उपयोगिता पूर्ण कर सकें। ( जैसे बडे बडे प्लान्ट लगाने के बजाय घर घर उपयोगी यूनिट लगाएँ, जैसे 1 - 3 किलोवाट की सोलर और विन्ड मिल, इसे मौसम अनुसार इन्टरचेंज करें।)
7) इन उपायों / प्रयोगों से रोजगार खोने वालों का अन्य रोजगारों में विस्थापन।
शेष है ----- IPYadav
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